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भाई दूज: यम और यमुना
स्रोत: पारंपरिक कथा (यम द्वितीया)
सूर्य देव और उनकी पत्नी संज्ञा की दो जुड़वाँ संतानें थीं: पुत्र यम और पुत्री यमुना। बचपन में दोनों साथ खेले, साथ बड़े हुए, और दोनों में अपार स्नेह था।
बड़े होकर दोनों के रास्ते अलग हो गए। यम को धर्मराज का पद मिला: प्राणियों के कर्मों का लेखा रखना और उनका न्याय करना। यमुना नदी बनकर धरती पर बहने लगीं।
यमुना को भाई की बहुत याद आती थी। वह बार-बार संदेश भेजती, “भैया, कभी मेरे घर आओ। मैं अपने हाथों से तुम्हें भोजन कराना चाहती हूँ।”
पर यमराज का काम कभी रुकता ही नहीं था। हर बार वे कहते, “बहन, अगली बार ज़रूर आऊँगा।” और वह अगली बार कभी आती ही नहीं थी। बरस बीतते गए। यमराज भी बहन को याद करते थे, पर तीनों लोकों के प्राणियों के कर्मों का हिसाब एक दिन के लिए भी कैसे छोड़ते?
यमुना फिर भी हर दिन भाई की राह देखती। उसने कभी शिकायत नहीं की, बस आँगन बुहारती, द्वार सजाती और सोचती, “शायद आज भैया आ जाएँ।” हर त्योहार पर वह भाई के लिए पकवान बनाती, और हर बार थाली सजी की सजी रह जाती।
फिर कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष की द्वितीया का दिन आया। सुबह यमुना रोज़ की तरह घर के काम में लगी थी कि अचानक द्वार पर किसी के आने की आहट हुई।
उसने मुड़कर देखा… द्वार पर स्वयं यमराज मुस्कुराते हुए खड़े थे।
यमुना की आँखें खुशी से भर आईं। वह दौड़कर भाई के पास गई। उसने उनके पैर धुलवाए, आसन पर बिठाया और आरती उतारी।
फिर उसने भाई के माथे पर प्रेम से तिलक लगाया। रसोई में जाकर अपने हाथों से तरह-तरह के व्यंजन बनाए और भाई को बड़े चाव से भोजन कराया। वह पास बैठी पंखा झलती रही और बचपन की बातें करती रही।
जिनके नाम से सारा संसार डरता है, वे यमराज उस दिन बस एक भाई थे, बहन के प्रेम में भीगे हुए। ऐसा सत्कार उन्हें कभी कहीं नहीं मिला था।
भोजन के बाद यमराज ने प्रसन्न होकर कहा, “बहन, आज तुमने मेरा मन जीत लिया। कोई भी वर माँग लो।”
यमुना ने अपने लिए कुछ नहीं माँगा। उसने कहा, “भैया, बस इतना वर दो कि तुम हर वर्ष इसी दिन मेरे घर आओ। और इस दिन जो भी भाई अपनी बहन के घर जाकर उससे तिलक करवाए और उसके हाथ का भोजन करे, उसे तुम्हारा भय न रहे।”
यमराज मुस्कुराए और बोले, “तथास्तु।” उन्होंने बहन को सुंदर वस्त्र और आभूषण भेंट किए और विदा ली।
तभी से कार्तिक शुक्ल द्वितीया को यम द्वितीया या भाई दूज कहा जाता है। इस दिन भाई बहन के घर जाते हैं, बहनें उनका तिलक करके आरती उतारती हैं, भोजन कराती हैं और भाई की लंबी आयु की कामना करती हैं।
भाई भी प्रेम से बहन को उपहार देते हैं और जीवन भर उसके मान और सुख की रक्षा का वचन निभाते हैं। मथुरा में इस दिन भाई-बहन साथ मिलकर यमुना में स्नान भी करते हैं।
इस कथा का संदेश
रिश्तों को समय और स्नेह चाहिए। यमुना ने अपने लिए नहीं, सब भाई-बहनों के लिए माँगा: यही निःस्वार्थ प्रेम भाई दूज की आत्मा है।
भाई दूज दीपावली के दो दिन बाद, कार्तिक शुक्ल द्वितीया को मनाया जाता है। बहनें भाई को रोली-अक्षत का तिलक लगाकर आरती उतारती हैं और भोजन कराती हैं। यह कथा लोक परंपरा में यम द्वितीया की कथा के रूप में प्रचलित है; कई क्षेत्रों में इस दिन चित्रगुप्त पूजा भी होती है।
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