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चंद्रघंटा

स्रोत: प्रचलित नवदुर्गा कथा (लोक परंपरा); शिव-बारात का प्रसंग: शिव पुराण, रुद्र संहिता, पार्वती खंड

पार्वती की तपस्या पूरी हुई और शिव ने उनसे विवाह का वचन दिया। हिमालय के नगर में उत्सव छा गया। तोरण सजे, मंगल गीत गूँजे, और रानी मेना अपने होने वाले दामाद को देखने के लिए अधीर हो उठीं।

बारात आने की ख़बर मिली। आगे-आगे देवता चल रहे थे, सुंदर वस्त्रों में, बाजों के साथ। मेना हर देवता को देखकर पूछतीं, “क्या यही शिव हैं?” और हर बार उत्तर मिलता, “नहीं, ये तो उनके सेवक हैं।”

फिर शिव के गण आए। कोई बिना सिर का, कोई अनेक सिरों वाला, कोई अत्यंत लंबा, कोई बहुत छोटा। भूत, प्रेत और पिशाच नाचते-गाते चले आ रहे थे। हवा में श्मशान की भस्म उड़ रही थी।

और उनके बीच, बैल पर सवार, स्वयं शिव। शरीर पर भस्म, गले में सर्प, सिर पर जटाएँ, माथे पर तीसरा नेत्र, और हाथ में त्रिशूल और कपाल। बाघ की खाल ही उनका वस्त्र थी।

मेना यह दृश्य सह न सकीं और मूर्छित होकर गिर पड़ीं। होश आया तो रो-रोकर बोलीं, “मैं अपनी फूल-सी बेटी इन्हें नहीं दूँगी! चाहे कुछ भी हो जाए, यह विवाह नहीं होगा।”

पूरे महल में सन्नाटा छा गया। बाराती द्वार पर खड़े थे, माँ विवाह से इनकार कर रही थीं, और मंगल का दिन संकट में बदलता दिख रहा था। सबकी आँखें पार्वती की ओर उठ गईं।

शिव पुराण बताता है कि पार्वती ने अपनी माँ से दृढ़ता से कहा कि वे शिव के सिवा किसी और से विवाह नहीं करेंगी। देवताओं और ऋषियों ने भी मेना को समझाया।

प्रचलित नवदुर्गा कथा इस प्रसंग को आगे बताती है। पार्वती ने देखा कि शिव का यह रूप सबको भयभीत कर रहा है। तब उन्होंने स्वयं एक तेजस्वी, शक्तिशाली रूप धारण किया। उनके मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र चमक रहा था। इसी कारण वे चंद्रघंटा कहलाईं।

इस रूप में देवी सिंह पर सवार थीं, दस भुजाओं में अस्त्र-शस्त्र थे, फिर भी उनका मुख शांत और करुणा से भरा था। वे शिव के सामने गईं और विनती की कि वे ऐसा रूप धारण करें जिससे उनकी माँ और नगरवासी प्रसन्न हो सकें।

शिव ने यह विनती मान ली। शिव पुराण में भी वर्णन है कि अंत में शिव ने अत्यंत सुंदर, दिव्य रूप धारण किया। करोड़ों कामदेवों जैसी सुंदरता, रत्नों के आभूषण और सुगंधित माला। उन्हें देखकर मेना का सारा भय दूर हो गया।

मेना ने स्वयं अपने दामाद की आरती उतारी। फिर बड़े धूमधाम से शिव और पार्वती का विवाह संपन्न हुआ, और सारे लोकों में आनंद छा गया।

यह कथा बताती है कि चंद्रघंटा का रूप भय को मिटाने वाला है। वे युद्ध के लिए सजी दिखती हैं, पर उनका उद्देश्य रक्षा और शांति है। मान्यता है कि उनके घंटे की ध्वनि से नकारात्मक शक्तियाँ दूर भागती हैं।

नवरात्रि के तीसरे दिन माँ चंद्रघंटा की पूजा होती है। भक्त मानते हैं कि उनकी कृपा से साहस बढ़ता है और मन का डर शांत होता है।

इस कथा का संदेश

जब परिस्थिति भय से भर जाए, तब साहस के साथ करुणा ही रास्ता खोलती है। चंद्रघंटा सिखाती हैं कि शक्ति का असली काम रक्षा और शांति है।

शारदीय और चैत्र नवरात्रि के तीसरे दिन, तृतीया को, माँ चंद्रघंटा की पूजा होती है। चंद्रघंटा रूप वाली कथा प्रचलित परंपरा से है; शिव-बारात और मेना के भय का प्रसंग शिव पुराण में मिलता है।

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