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छठ: सूर्य उपासना की कथा

स्रोत: महाभारत, वन पर्व (कुंडलाहरण पर्व); छठ से संबंध लोक परंपरा

छठ पर्व में व्रती जल में खड़े होकर डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य देते हैं। लोक परंपरा इस उपासना को महाभारत के एक महान सूर्य-भक्त से जोड़ती है: अंगराज कर्ण।

कर्ण सूर्य देव के पुत्र थे। वे जन्म से ही शरीर पर एक दिव्य कवच और कानों में कुंडल लेकर आए थे। जब तक ये उनके शरीर पर थे, कोई भी उन्हें युद्ध में पराजित नहीं कर सकता था।

महाभारत बताता है कि कर्ण प्रतिदिन जल में खड़े होकर, हाथ जोड़कर सूर्य देव की उपासना करते थे, जब तक सूर्य की किरणें उनकी पीठ को तपा न दें। और उपासना के समय यदि कोई ब्राह्मण उनसे कुछ माँगता, तो कर्ण कभी मना नहीं करते थे।

उधर पांडवों के पिता इंद्र चिंतित थे। वे जानते थे कि कवच-कुंडल के रहते अर्जुन कर्ण को नहीं जीत सकेंगे। इंद्र ने निश्चय किया कि वे ब्राह्मण का वेश धरकर कर्ण से कवच-कुंडल माँग लेंगे।

पर पुत्र-स्नेह में सूर्य देव ने एक रात स्वप्न में ब्राह्मण के रूप में कर्ण को दर्शन दिए: “पुत्र, कल इंद्र तुमसे कवच-कुंडल माँगने आएँगे। उन्हें मत देना, इन्हीं में तुम्हारे प्राणों की रक्षा है।”

कर्ण ने विनम्रता से उत्तर दिया, “भगवन, मेरा व्रत है कि उपासना के समय कोई कुछ माँगे तो मैं मना नहीं करता। प्राण जाएँ तो जाएँ, पर मेरा वचन और यश न जाए।”

अगली दोपहर कर्ण जल में खड़े सूर्य को अर्घ्य दे रहे थे। तभी एक तेजस्वी ब्राह्मण उनके सामने आकर खड़ा हुआ और हाथ फैलाकर बोला, “मुझे भिक्षा चाहिए…”

कर्ण ने पहचान लिया कि ये इंद्र हैं। फिर भी उन्होंने हाथ जोड़कर कहा, “ब्राह्मण देव, आपको गाँव, धन, गायें, जो चाहें दे सकता हूँ।” पर ब्राह्मण ने कहा, “मुझे केवल तुम्हारे कवच और कुंडल चाहिए।”

कर्ण ने एक क्षण भी संकोच नहीं किया। उन्हें स्वप्न में सूर्य देव की कही दूसरी बात याद थी: “यदि देना ही पड़े, तो बदले में इंद्र से उनकी अमोघ शक्ति माँग लेना।”

कर्ण बोले, “देवराज, मैं कवच-कुंडल दूँगा। बदले में मुझे अपनी अमोघ शक्ति दीजिए।” इंद्र ने वचन दिया: “यह शक्ति एक बार चलेगी और एक शत्रु का अंत करके मेरे पास लौट आएगी।”

इंद्र ने यह भी वर दिया कि कवच उतारने से कर्ण के शरीर पर कोई घाव या कुरूपता नहीं रहेगी। तब कर्ण ने अपने ही हाथों से शरीर से जुड़ा कवच काटकर उतारा और कुंडल भी उतारकर इंद्र को सौंप दिए।

यह देखकर देवता, मनुष्य, सब अचंभित रह गए। शरीर काटकर कवच उतारने के कारण कर्ण का एक नाम वैकर्तन पड़ा। उनका यह दान युगों तक याद किया गया, और वे दानवीर कर्ण कहलाए।

महाभारत में कर्ण की यह उपासना, जल में खड़े होकर, हाथ जोड़कर, तपते सूर्य को निहारते हुए, एक भक्त की अडिग निष्ठा का चित्र है।

अंग देश, जिसके राजा कर्ण थे, आज के बिहार के भागलपुर-मुंगेर क्षेत्र में माना जाता है। इसीलिए बिहार की लोक परंपरा कहती है कि जल में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देने की जो रीति छठ में है, उसकी प्रेरणा सूर्य-पुत्र कर्ण की यही उपासना है।

आज भी छठ के दिन लाखों व्रती नदी-तालाबों में कमर तक जल में खड़े होकर, सूप में ठेकुआ और फल सजाकर, पहले अस्ताचलगामी और फिर उदीयमान सूर्य को अर्घ्य देते हैं: वही श्रद्धा, वही अडिग निष्ठा।

इस कथा का संदेश

सच्ची उपासना केवल माँगना नहीं, देना भी है। कर्ण ने दिखाया कि वचन और श्रद्धा प्राणों से भी बड़े हो सकते हैं।

छठ पर्व कार्तिक शुक्ल चतुर्थी (नहाय-खाय) से सप्तमी तक चार दिन मनाया जाता है; षष्ठी की संध्या को डूबते सूर्य को और सप्तमी की भोर में उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है, और छठी मैया की पूजा होती है। छठ की उत्पत्ति को लेकर कई परंपराएँ प्रचलित हैं: कर्ण की सूर्य उपासना, वनवास में द्रौपदी का सूर्य व्रत, और ब्रह्मवैवर्त पुराण में राजा प्रियव्रत और षष्ठी देवी की कथा। कर्ण की उपासना और कवच-कुंडल दान महाभारत में है; उसका छठ से संबंध लोक परंपरा का है।

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