← Divine Astro
हिन्दी
WhatsApp पर भेजें

दीपावली: लक्ष्मी पूजन की कथा

स्रोत: लोक कथा (साहूकार की बेटी और पीपल वाली लक्ष्मी)

एक गाँव में एक साहूकार रहता था। उसकी एक बेटी थी, सीधी-सादी और श्रद्धालु। वह हर सुबह स्नान करके गाँव के बाहर वाले पीपल के पेड़ पर जल चढ़ाने जाती थी।

उस पीपल पर माता लक्ष्मी का वास था। लड़की की सच्ची श्रद्धा देखकर एक दिन लक्ष्मी जी एक सुंदर स्त्री के रूप में उसके सामने आईं और मुस्कुराकर बोलीं, “क्या तुम मेरी सखी बनोगी?”

लड़की ने भोलेपन से कहा, “मैं अपने पिता से पूछकर बताऊँगी।” घर आकर उसने पिता को सब बताया। साहूकार समझ गया कि यह कोई साधारण स्त्री नहीं है। उसने कहा, “बेटी, उसकी सखी अवश्य बनो।”

अगले दिन लड़की ने हाँ कह दी। कुछ दिनों बाद लक्ष्मी जी ने उसे अपने घर बुलाया। वहाँ उसका ऐसा स्वागत हुआ कि वह देखती रह गई: सोने की चौकी पर बिठाया, सोने-चाँदी के थालों में छप्पन भोग परोसे, और ओढ़ने को सुंदर दुशाला दिया।

विदा करते समय लक्ष्मी जी ने कहा, “सखी, अब मैं भी तुम्हारे घर आऊँगी।”

यह सुनते ही लड़की का चेहरा उतर गया। वह चुपचाप घर लौटी और उदास होकर बैठ गई। पिता ने कारण पूछा, तो बोली, “पिताजी, सखी ने मेरा इतना सत्कार किया। अब वह हमारे घर आएँगी। मैं उन्हें कहाँ बिठाऊँगी? क्या खिलाऊँगी? हमारे पास तो उनके योग्य कुछ भी नहीं।”

साहूकार ने स्नेह से कहा, “बेटी, चिंता मत करो। जो है, उसी से प्रेम से स्वागत करना। पहले घर को अच्छी तरह साफ़ करो, लीपो-पोतो, और एक दीपक जलाकर सखी की राह देखो।”

लड़की ने वैसा ही किया। उसने आँगन बुहारा, घर को चमकाया, द्वार पर रंगोली बनाई और श्रद्धा से एक दीपक जलाया। वह मन ही मन प्रार्थना करती रही, “माँ, मेरी लाज रखना।”

तभी एक चील उड़ती हुई आई और उसके आँगन में एक बहुमूल्य हार गिराकर चली गई। लड़की ने पिता को दिखाया। पिता ने कहा, “यह सखी के स्वागत के लिए ही आया है।” उस हार से सोने की चौकी, सुंदर थाल और स्वादिष्ट भोजन का प्रबंध हो गया।

थोड़ी ही देर में लक्ष्मी जी, भगवान गणेश के साथ, उसके घर पधारीं। लड़की ने आगे बढ़कर दोनों का स्वागत किया और सोने की चौकी की ओर संकेत करके कहा, “सखी, विराजिए।”

लक्ष्मी जी मुस्कुराईं: “सखी, मैं तो कहीं ठहरती नहीं। राजा-महाराजाओं की चौकी पर भी नहीं बैठती।” पर लड़की ने प्रेम से हठ किया, “आज तो आपको बैठना ही होगा।”

सखी के प्रेम के आगे लक्ष्मी जी चौकी पर विराज गईं। लड़की ने बड़े आदर से गणेश जी और लक्ष्मी जी को भोजन कराया। फिर हाथ जोड़कर कहा, “सखी, मैं अभी आती हूँ। जब तक मैं न लौटूँ, आप यहीं विराजिए।”

लक्ष्मी जी ने वचन दे दिया। और कथा कहती है कि वह लड़की उस दिन लौटकर ही नहीं आई। अपने वचन से बँधी लक्ष्मी जी उसी घर में ठहर गईं, और साहूकार का घर धन-धान्य से भर गया।

इसीलिए दीपावली पर लोग घर को साफ़-सुथरा करते हैं, द्वार पर रंगोली बनाते हैं, दीपक जलाते हैं, और लक्ष्मी जी के साथ गणेश जी की पूजा करके प्रार्थना करते हैं: “हे माँ, जैसे उस सखी के घर ठहरीं, वैसे हमारे घर भी ठहरिए।”

इस कथा का संदेश

लक्ष्मी वहाँ आती हैं जहाँ स्वच्छता, श्रद्धा और प्रेम हो, और वहीं ठहरती हैं जहाँ उन्हें सखी की तरह अपनापन मिले।

दीपावली की संध्या को प्रदोष काल में घर को दीपों से सजाकर लक्ष्मी-गणेश की पूजा की जाती है। यह कथा उत्तर भारत में लोक कथा के रूप में कही-सुनी जाती है और इसके कई रूप प्रचलित हैं; कहीं हार रानी का बताया जाता है, कहीं लड़की की जगह साहूकार की बहू होती है। दीपावली की एक और प्रसिद्ध लोक कथा राजा और धोबिन (या रानी के खोए हार) की भी है।

कथा पढ़ ली — अब अपनी कुंडली देखें

जन्म तिथि, समय और स्थान से मुफ़्त कुंडली, दशा और ग्रह स्थिति। AI ज्योतिषी से पहले 10 सवाल फ्री — कोई कार्ड नहीं चाहिए।

मुफ़्त कुंडली बनाएँ

आज का पंचांग देखें

आगे