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करवा चौथ: वीरवती की कथा
स्रोत: पारंपरिक व्रत कथा (करवा चौथ)
बहुत पहले की बात है। एक साहूकार के सात बेटे थे और एक ही बेटी थी, जिसका नाम था वीरवती। सातों भाई अपनी बहन पर जान छिड़कते थे। उसे ज़रा-सा भी दुख हो, तो वे बेचैन हो उठते थे।
वीरवती का विवाह हुआ। विवाह के बाद पहली करवा चौथ आई तो वह अपने मायके में थी। उसने भोर से ही निर्जल व्रत रखा। न अन्न, न जल। मन में बस एक ही कामना थी: पति की लंबी आयु।
दिन ढलने लगा। भूख और प्यास से वीरवती का कोमल शरीर कुम्हलाने लगा। शाम होते-होते वह इतनी निढाल हो गई कि बार-बार आँगन में आकर आकाश की ओर देखती: चंद्रमा कब निकलेगा?
भाइयों से बहन की यह दशा देखी न गई। उन्होंने आपस में सलाह की। एक भाई दूर पीपल के पेड़ पर चढ़ गया और पत्तों की ओट में दीपक जलाकर उसके आगे छलनी रख दी। दूर से वह रोशनी ठीक उगते चाँद जैसी दिखने लगी।
भाइयों ने पुकारा, “बहन, देखो! चाँद निकल आया। अर्घ्य दे दो और भोजन कर लो।” भाभियों ने उसे समझाया भी कि यह चाँद नहीं है, पर भोली वीरवती ने भाइयों की बात पर विश्वास कर लिया।
उसने उस रोशनी को अर्घ्य दिया और भोजन करने बैठी। पहले कौर में बाल निकला। दूसरे कौर पर उसे छींक आई। और तीसरा कौर उठाया ही था कि ससुराल से एक दूत दौड़ता हुआ आया…
“तुम्हारे पति अब इस संसार में नहीं रहे।”
वीरवती के पैरों तले से धरती खिसक गई। वह रोती-बिलखती ससुराल पहुँची। वहाँ पति का निर्जीव शरीर देखकर वह फूट-फूटकर रो पड़ी। उसे समझ आ गया कि उसका व्रत अधूरा रह गया था।
उसी रात देवताओं की रानी इंद्राणी पृथ्वी पर आईं। वीरवती ने उनके चरण पकड़ लिए और पूछा, “माँ, मुझसे ऐसी क्या भूल हुई?”
इंद्राणी ने स्नेह से कहा, “बेटी, तुमने चंद्रमा के दर्शन से पहले ही व्रत खोल दिया। तुम्हारे भाइयों ने प्रेम में छल किया, और तुमने अनजाने में उसे सच मान लिया।”
वीरवती ने हाथ जोड़कर कहा, “माँ, मैं अपनी भूल सुधारना चाहती हूँ। मुझे राह दिखाइए।” इंद्राणी बोलीं, “पूरे वर्ष हर चौथ का व्रत श्रद्धा से करो, और अगली करवा चौथ का व्रत पूरे विधि-विधान से, चंद्रमा को अर्घ्य देकर ही खोलना।”
वीरवती ने पति के शरीर को छोड़ा नहीं। वह पूरे वर्ष उसकी सेवा करती रही, उसे सँभालती रही, और हर महीने चौथ का व्रत रखती रही। लोगों ने बहुत कुछ कहा, पर उसका धैर्य नहीं डिगा।
एक वर्ष बीता और फिर करवा चौथ आई। इस बार वीरवती ने भोर से निर्जल व्रत रखा, करवे की पूजा की, कथा सुनी, और रात को जब सचमुच चंद्रमा उगा, तभी उसे अर्घ्य दिया।
उसकी श्रद्धा देखकर माता करवा प्रसन्न हुईं। वीरवती ने जैसे ही व्रत पूरा किया, उसके पति ने आँखें खोलीं, मानो लंबी नींद से जागे हों। वीरवती की आँखों से आँसू बह निकले, पर इस बार वे खुशी के आँसू थे।
तब से सुहागिनें करवा चौथ का व्रत चंद्रमा के दर्शन के बाद ही खोलती हैं, और इस दिन वीरवती की कथा सुनती-सुनाती हैं।
इस कथा का संदेश
भूल किसी से भी हो सकती है। वीरवती की तरह श्रद्धा, धैर्य और सच्चे पश्चाताप से हर भूल सुधारी जा सकती है।
करवा चौथ पर सुहागिन स्त्रियाँ सूर्योदय से निर्जल व्रत रखती हैं, शाम को करवा माता की पूजा कर यह कथा सुनती हैं, और चंद्रोदय के बाद छलनी से चंद्रमा व पति के दर्शन कर अर्घ्य देकर व्रत खोलती हैं। कथा के कई रूप प्रचलित हैं: कहीं वीरवती को राह इंद्राणी दिखाती हैं, कहीं माता पार्वती; कहीं पति गंभीर रूप से बीमार होते हैं, कहीं प्राण छोड़ देते हैं।
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