हिन्दी
कात्यायनी
स्रोत: वामन पुराण (महिषासुर प्रसंग); श्रीमद्भागवत, दशम स्कंध, अध्याय 22; नवदुर्गा परंपरा
बहुत समय पहले कत नाम के एक ऋषि हुए। उनके वंश में आगे महर्षि कात्यायन का जन्म हुआ, जो बड़े तपस्वी और देवी के परम भक्त थे।
प्रचलित कथा कहती है कि कात्यायन के मन में एक ही इच्छा थी: स्वयं जगदंबा उनके घर पुत्री बनकर आएँ। इसी इच्छा से उन्होंने वर्षों तक कठोर तप किया।
उन्हीं दिनों महिषासुर नाम के असुर का आतंक बढ़ता जा रहा था। उसने देवताओं को युद्ध में हराकर स्वर्ग से निकाल दिया था और स्वयं इंद्र के आसन पर बैठ गया था।
हारे हुए देवता ब्रह्मा को आगे करके शिव और विष्णु के पास पहुँचे और अपनी व्यथा सुनाई। महिषासुर के अत्याचार की बातें सुनकर विष्णु और शिव क्रोध से भर उठे।
उस क्रोध से उनके मुख से प्रचंड तेज निकला। फिर ब्रह्मा, इंद्र और सभी देवताओं के शरीर से भी तेज निकलने लगा। सारा तेज एक जगह इकट्ठा होने लगा, मानो कोई जलता हुआ पर्वत हो।
वामन पुराण बताता है कि यह तेज-पुंज एक तपस्वी के आश्रम की ओर बढ़ा। वह आश्रम था महर्षि कात्यायन का। आश्रम के वृक्ष, नदी और आकाश, सब उस प्रकाश से जगमगा उठे।
ध्यान में बैठे कात्यायन ने आँखें खोलीं। सामने हज़ारों सूर्यों जैसा प्रकाश था, और उस प्रकाश में धीरे-धीरे एक आकार उभर रहा था…
उस तेज-पुंज से एक दिव्य देवी प्रकट हुईं। उनका तेज तीनों लोकों में फैल गया। देवताओं के तेज से बनी ये देवी महर्षि कात्यायन के आश्रम में प्रकट हुई थीं, इसलिए वे कात्यायनी कहलाईं।
प्रचलित परंपरा के अनुसार महर्षि कात्यायन ने ही सबसे पहले देवी का पूजन किया, और देवी ने उन्हें पुत्री की तरह स्नेह दिया। ऋषि की वर्षों की साधना सफल हुई।
देवताओं ने देवी को अपने-अपने अस्त्र भेंट किए। सिंह पर सवार होकर देवी महिषासुर से युद्ध करने चलीं, और भीषण युद्ध के बाद उन्होंने उस असुर का अंत कर दिया। इसीलिए कात्यायनी को महिषासुर मर्दिनी भी कहा जाता है।
कात्यायनी की महिमा एक और सुंदर कथा में मिलती है। श्रीमद्भागवत बताता है कि व्रज की गोपियों ने मार्गशीर्ष मास में पूरे एक महीने तक देवी कात्यायनी का व्रत किया। वे सुबह यमुना में स्नान करतीं, बालू से देवी की प्रतिमा बनातीं और पूजा करतीं।
उनकी प्रार्थना थी: “कात्यायनि महामाये महायोगिन्यधीश्वरि। नन्दगोपसुतं देवि पतिं मे कुरु ते नमः॥” अर्थात्, हे कात्यायनी, हे महामाया, नंद गोप के पुत्र श्रीकृष्ण को मेरा पति बनाइए। आपको नमस्कार है। व्रत के अंत में श्रीकृष्ण ने उनकी निष्कपट भक्ति स्वीकार की और उन्हें वचन दिया कि आने वाली शरद ऋतु की रातों में उनका संकल्प पूरा होगा। गोपियों की एक महीने की साधना सफल हुई।
इसी कारण आज भी मान्यता है कि मनचाहे जीवनसाथी और सुखी वैवाहिक जीवन के लिए माँ कात्यायनी की उपासना की जाती है।
माँ कात्यायनी का रूप तेजस्वी है। उनकी चार भुजाएँ हैं: एक में तलवार, एक में कमल, और बाकी दो अभय और वर मुद्रा में। उनका वाहन सिंह है।
इस कथा का संदेश
जब सारी शक्तियाँ एक लक्ष्य के लिए जुड़ती हैं, तब कात्यायनी प्रकट होती हैं। सच्ची साधना और एकजुट संकल्प कभी व्यर्थ नहीं जाते।
शारदीय और चैत्र नवरात्रि के छठे दिन, षष्ठी को, माँ कात्यायनी की पूजा होती है। कात्यायन की पुत्री-इच्छा वाला अंश प्रचलित परंपरा से है; आश्रम में देवी के प्रकट होने का वर्णन वामन पुराण में है।
कथा पढ़ ली — अब अपनी कुंडली देखें
जन्म तिथि, समय और स्थान से मुफ़्त कुंडली, दशा और ग्रह स्थिति। AI ज्योतिषी से पहले 10 सवाल फ्री — कोई कार्ड नहीं चाहिए।
मुफ़्त कुंडली बनाएँ