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कूष्मांडा

स्रोत: प्रचलित नवदुर्गा परंपरा; सृष्टि से पहले की अवस्था: ऋग्वेद, नासदीय सूक्त (10.129); देवी की सृजन-शक्ति: दुर्गा सप्तशती, अध्याय 1

सोचिए उस समय को, जब कुछ भी नहीं था। न धरती, न आकाश, न सूर्य, न चंद्रमा, न तारे। न दिन था, न रात।

ऋग्वेद का नासदीय सूक्त उस अवस्था का वर्णन करता है: तब न सत् था, न असत्। अंधकार से ढका हुआ अंधकार था। चारों ओर केवल गहरा, अथाह सन्नाटा।

उस अंधकार में न कोई हलचल थी, न कोई ध्वनि। समय भी जैसे ठहरा हुआ था। कोई देखने वाला नहीं था, कोई सुनने वाला नहीं था। केवल एक शक्ति थी, जो इस सबसे परे, अपने आप में स्थित थी।

दुर्गा सप्तशती में ब्रह्मा देवी की स्तुति करते हुए कहते हैं, “हे देवी, आप ही इस विश्व को धारण करती हैं, आप ही इसे रचती हैं, आप ही इसका पालन करती हैं, और अंत में आप ही इसे अपने में समेट लेती हैं।”

नवदुर्गा की प्रचलित कथा बताती है कि सृष्टि से पहले, उस अनंत अंधकार में, वही आदिशक्ति विराजमान थीं। उनके भीतर पूरा ब्रह्मांड बीज की तरह सोया हुआ था, प्रकट होने की प्रतीक्षा में। इस कथा के अनुसार तब त्रिदेव भी प्रकट नहीं हुए थे। न कोई रचने वाला था, न पालने वाला, न समेटने वाला। सब कुछ उसी एक शक्ति के भीतर था।

और तब, उस मौन के बीच, देवी के होठों पर एक हल्की-सी मुस्कान आई…

देवी की उस मंद, हल्की मुस्कान से प्रकाश फूट पड़ा। अंधकार छँटने लगा, और ऊर्जा से भरा एक ब्रह्मांडीय अंड, यानी सृष्टि का अंडा, प्रकट हुआ। उसी से आगे लोकों, ग्रहों और प्राणियों की रचना हुई।

इसीलिए देवी का नाम पड़ा कूष्मांडा। प्रचलित व्याख्या के अनुसार “कु” यानी थोड़ा, “ऊष्मा” यानी गर्मी या ऊर्जा, और “अंड” यानी ब्रह्मांडीय अंडा। थोड़ी-सी ऊर्जा से, एक मुस्कान से, जिन्होंने पूरे ब्रह्मांड को जन्म दिया, वे कूष्मांडा हैं।

परंपरा कहती है कि देवी का निवास सूर्य मंडल के भीतर है। सूर्य के उस प्रचंड तेज में रह सकने की शक्ति केवल उन्हीं में है। सूर्य को प्रकाश और ऊर्जा उन्हीं से मिलती है, और उनके शरीर की कांति सूर्य जैसी ही दीप्त है।

माँ कूष्मांडा को अष्टभुजा भी कहते हैं। उनकी आठ भुजाओं में कमंडलु, धनुष, बाण, कमल, अमृत से भरा कलश, चक्र और गदा हैं, और आठवें हाथ में सिद्धियाँ और निधियाँ देने वाली जप माला है। उनका वाहन सिंह है।

संस्कृत में कूष्मांड का अर्थ कुम्हड़ा या पेठा भी होता है। इसी कारण कई स्थानों पर उनकी पूजा में कुम्हड़े का भोग चढ़ाने की परंपरा है।

यह कथा किसी युद्ध या असुर की नहीं, आरंभ की कथा है। जहाँ कुछ नहीं था, वहाँ एक मुस्कान ने सब कुछ रच दिया। भक्त मानते हैं कि माँ कूष्मांडा की उपासना से रोग और शोक दूर होते हैं, और आयु, यश और बल बढ़ता है।

नवरात्रि का चौथा दिन इसी आदिशक्ति को समर्पित है, जिन्होंने अंधकार में पहला प्रकाश जलाया। इस दिन भक्त प्रसन्न मन से माँ की पूजा करते हैं, और कई घरों में उन्हें मालपुए का भोग लगाया जाता है।

इस कथा का संदेश

सृजन बड़े शोर से नहीं, एक मंद मुस्कान से भी शुरू हो सकता है। प्रसन्न मन से किया गया छोटा आरंभ भी पूरा संसार रच सकता है।

शारदीय और चैत्र नवरात्रि के चौथे दिन, चतुर्थी को, माँ कूष्मांडा की पूजा होती है। मुस्कान से ब्रह्मांड रचने की कथा प्रचलित नवदुर्गा परंपरा से है, किसी एक पुराण से नहीं।

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