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मोक्षदा एकादशी: राजा वैखानस

स्रोत: पारंपरिक एकादशी व्रत कथा (ब्रह्मांड पुराण की मानी जाती है)

युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण से मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष की एकादशी के बारे में पूछा। श्रीकृष्ण बोले, “राजन, इसका नाम मोक्षदा एकादशी है, जो मोक्ष देने वाली है। इसकी कथा सुनो।”

प्राचीन काल में चंपक नगर में वैखानस नाम के एक धर्मात्मा राजा राज करते थे। वे प्रजा का पुत्र की तरह पालन करते थे। उनके राज्य में वेदों के ज्ञाता ब्राह्मण रहते थे, और प्रजा सुखी थी।

एक रात राजा ने एक विचित्र स्वप्न देखा। उन्होंने देखा कि उनके स्वर्गीय पिता नरक में कष्ट भोग रहे हैं, और उनसे पुकारकर कह रहे हैं, “पुत्र, मुझे इस कष्ट से उबारो।”

राजा की नींद टूट गई। बाकी रात उन्हें चैन नहीं आया। सुबह होते ही उन्होंने राज्य के विद्वान ब्राह्मणों को बुलाया और भारी मन से अपना स्वप्न सुनाया।

“मेरे पिता कष्ट में हैं, और मैं यहाँ राजसुख भोग रहा हूँ। ऐसे पुत्र का क्या लाभ, जो पिता के काम न आ सके? मुझे बताइए, मैं क्या करूँ? किस दान, तप या व्रत से मेरे पिता को मुक्ति मिलेगी?”

ब्राह्मणों ने विचार किया और कहा, “राजन, पास ही वन में पर्वत मुनि का आश्रम है। वे भूत, भविष्य और वर्तमान सब जानते हैं। आप उनकी शरण में जाइए।”

राजा तुरंत आश्रम पहुँचे और मुनि के चरणों में प्रणाम करके सारी बात कही। पर्वत मुनि ने आँखें बंद कीं और ध्यान में लीन हो गए। कुछ देर बाद उन्होंने आँखें खोलीं… उनके चेहरे पर गंभीरता थी।

मुनि बोले, “राजन, मैंने तुम्हारे पिता के कर्म देखे। पूर्व जन्म में उन्होंने अपनी एक पत्नी के प्रति अपने धर्म की उपेक्षा की थी और उसे दुख पहुँचाया था। उसी कर्म के कारण वे आज यह कष्ट भोग रहे हैं।”

राजा ने हाथ जोड़कर पूछा, “मुनिवर, क्या कोई उपाय है?” मुनि बोले, “है। मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष में मोक्षदा एकादशी आती है। तुम अपने परिवार के साथ उस दिन विधिपूर्वक व्रत करो, और उसका पुण्य अपने पिता को अर्पित करो। उस पुण्य से उन्हें मुक्ति मिलेगी।”

राजा मुनि को प्रणाम करके लौट आए। जब मोक्षदा एकादशी आई, तो उन्होंने रानियों, पुत्रों और परिवार के साथ पूरी श्रद्धा से व्रत किया।

दशमी को संयम से एक समय भोजन, एकादशी को उपवास, भगवान विष्णु की पूजा, कथा-श्रवण और रात्रि जागरण, और द्वादशी को ब्राह्मणों को भोजन और दान करके पारण, सब कुछ विधि से हुआ।

फिर राजा ने हाथ में जल लेकर संकल्प किया: “इस व्रत का सारा पुण्य मैं अपने पिता को अर्पित करता हूँ।”

उसी क्षण आकाश से पुष्पों की वर्षा हुई। राजा ने देखा कि उनके पिता कष्ट से मुक्त होकर, दिव्य रूप में, स्वर्ग की ओर जा रहे हैं। जाते-जाते पिता ने पुत्र को आशीर्वाद दिया: “पुत्र, तुम्हारा कल्याण हो।”

राजा की आँखों से आनंद के आँसू बह निकले। उस दिन उन्हें लगा कि राजपाट से भी बड़ा सुख पिता के प्रति कर्तव्य निभाने में है।

श्रीकृष्ण ने कहा, “राजन, यह एकादशी चिंतामणि के समान है। इसका व्रत करने वाला स्वयं भी शुभ गति पाता है, और अपने पितरों को भी शुभ गति दिलाता है।”

इस कथा का संदेश

सच्ची संतान वही है जो अपने पूर्वजों के प्रति कर्तव्य को याद रखे। श्रद्धा से किया पुण्य पीढ़ियों तक प्रकाश फैलाता है।

मोक्षदा एकादशी मार्गशीर्ष (अगहन) शुक्ल पक्ष में आती है। परंपरा में यही दिन गीता जयंती के रूप में भी मनाया जाता है, जब कुरुक्षेत्र में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया माना जाता है। इस दिन उपवास, भगवान विष्णु की पूजा, गीता पाठ और दान की परंपरा है, और द्वादशी को पारण किया जाता है। एकादशी व्रत कथाओं का स्रोत अलग-अलग ग्रंथों में बताया जाता है; यह कथा परंपरा से ब्रह्मांड पुराण की मानी जाती है। कुछ रूपों में राजा का नगर गोकुल बताया गया है।

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