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पापांकुशा एकादशी व्रत कथा
स्रोत: पारंपरिक एकादशी व्रत कथा (ब्रह्मवैवर्त पुराण की मानी जाती है)
युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा, “प्रभु, आश्विन शुक्ल पक्ष की एकादशी का क्या नाम है?” श्रीकृष्ण बोले, “राजन, इसे पापांकुशा एकादशी कहते हैं। जैसे अंकुश हाथी को वश में करता है, वैसे यह व्रत पाप रूपी हाथी पर अंकुश लगाता है। इसकी कथा सुनो।”
विंध्य पर्वत पर क्रोधन नाम का एक बहेलिया रहता था। जैसा नाम, वैसा स्वभाव। वह अत्यंत क्रूर था। पशु-पक्षियों का शिकार, राहगीरों को लूटना, झूठ, हिंसा… उसका सारा जीवन ऐसे ही कर्मों में बीता।
उसने कभी किसी पर दया नहीं की, न कभी भगवान का नाम लिया, न कोई पुण्य कर्म किया। वर्ष पर वर्ष बीतते गए, और वह बूढ़ा हो चला।
जब उसके जीवन का अंतिम समय निकट आया, तो एक दिन यमराज के दूत उसके सामने आए और बोले, “क्रोधन, कल तुम्हारा अंतिम दिन है। हम तुम्हें लेने आएँगे।”
यह सुनकर क्रोधन, जो जीवन भर किसी से नहीं डरा था, पहली बार भीतर तक काँप गया। उसकी आँखों के सामने उसका पूरा जीवन घूम गया: हर हिंसा, हर छल। उसे लगा, मैंने यह जीवन किस काम में गँवा दिया?
बेचैन होकर वह जंगल में भटकता रहा, और भटकते-भटकते एक शांत आश्रम में पहुँचा। वह आश्रम था महर्षि अंगिरा का।
क्रोधन ऋषि के चरणों में गिर पड़ा। उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे। वह बोला, “मुनिवर, मैंने जीवन भर केवल पाप किए हैं। अब मेरे पास बस एक दिन है। क्या मेरे लिए भी कोई राह है?”
महर्षि अंगिरा ने करुणा से उसकी ओर देखा। उन्होंने उसे डाँटा नहीं, ठुकराया नहीं। वे जानते थे कि जो सच्चे मन से पछताकर शरण में आता है, उसके लिए भगवान का द्वार कभी बंद नहीं होता।
ऋषि बोले, “वत्स, कल आश्विन शुक्ल पक्ष की पापांकुशा एकादशी है। तुम कल पूरी श्रद्धा से उपवास करो, भगवान विष्णु की पूजा करो, उनका नाम जपो और रात भर जागकर उनका स्मरण करो। तुम्हारा मन निर्मल होगा।”
क्रोधन ने वैसा ही किया। जिसने जीवन भर हिंसा की थी, उसने उस दिन अन्न-जल त्यागकर, ऋषि के बताए अनुसार भगवान की पूजा की। उसके मन में पहली बार शांति उतरी।
पूरे दिन वह भगवान के नाम में डूबा रहा। रात में भी वह जागकर भजन करता रहा। उसका मन अपने पुराने कर्मों पर पछताता रहा, और भगवान की करुणा पर विश्वास करता रहा।
एकादशी के व्रत और सच्चे पश्चाताप के प्रभाव से उसके सारे पाप नष्ट हो गए। कथा कहती है कि जब उसका अंतिम समय आया, तो यमदूत नहीं, भगवान विष्णु के पार्षद आए, और क्रोधन दिव्य रूप धारण कर गरुड़ पर सवार होकर विष्णु लोक को गया।
श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा, “राजन, यह व्रत अंकुश की तरह मन को पाप से रोकता है। इस दिन भगवान पद्मनाभ की पूजा करनी चाहिए, और सामर्थ्य अनुसार अन्न, जल, वस्त्र, भूमि, गाय आदि का दान करना चाहिए।”
कथा का सार यही है कि भगवान की शरण में आने के लिए कभी देर नहीं होती। एक सच्चा पश्चाताप, एक सच्चा संकल्प, जीवन की दिशा बदल सकता है।
इस कथा का संदेश
भगवान की शरण में आने में कभी देर नहीं होती। सच्चा पश्चाताप और एक सच्चा संकल्प जीवन की दिशा बदल सकता है।
पापांकुशा एकादशी आश्विन शुक्ल पक्ष में, दशहरे के अगले दिन के आसपास आती है। इस दिन भगवान विष्णु के पद्मनाभ स्वरूप की पूजा, उपवास, रात्रि जागरण और दान की परंपरा है, और द्वादशी को पारण किया जाता है। एकादशी व्रत कथाओं का स्रोत अलग-अलग ग्रंथों में बताया जाता है; यह कथा परंपरा से ब्रह्मवैवर्त पुराण की मानी जाती है।
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