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रमा एकादशी व्रत कथा: चंद्रभागा और शोभन

स्रोत: पारंपरिक एकादशी व्रत कथा (ब्रह्मवैवर्त पुराण की मानी जाती है)

युधिष्ठिर के पूछने पर श्रीकृष्ण ने कार्तिक कृष्ण पक्ष की एकादशी की कथा सुनाई, जिसे रमा एकादशी कहते हैं। रमा, अर्थात माता लक्ष्मी।

प्राचीन काल में मुचुकुंद नाम के एक प्रतापी राजा थे, जो भगवान विष्णु के भक्त थे। उनके राज्य में एकादशी का पालन इतनी निष्ठा से होता था कि उस दिन मनुष्य तो क्या, पशु-पक्षी भी अन्न-जल नहीं लेते थे।

राजा की एक पुत्री थी, चंद्रभागा। उसका विवाह राजा चंद्रसेन के पुत्र शोभन से हुआ था। शोभन स्वभाव से अच्छे थे, पर शरीर से बहुत दुर्बल थे। वे एक समय भी भूखे नहीं रह सकते थे।

एक बार कार्तिक मास में शोभन ससुराल आए। संयोग से अगले ही दिन एकादशी थी। राजा की आज्ञा से नगर में ढोल बजाकर घोषणा हुई: “कल एकादशी है। कोई भी अन्न ग्रहण न करे।”

शोभन चिंतित होकर पत्नी के पास गए: “प्रिये, मैं भूख सहन नहीं कर पाऊँगा। कोई उपाय बताओ।” चंद्रभागा बोली, “स्वामी, मेरे पिता के राज्य में एकादशी को कोई भोजन नहीं करता। यदि आप भोजन करना चाहें, तो किसी और स्थान पर चले जाइए।”

शोभन ने कुछ देर सोचा, फिर दृढ़ता से कहा, “नहीं, मैं भी व्रत करूँगा। आगे जो भगवान की इच्छा।”

उन्होंने व्रत रखा। पर दिन ढलते-ढलते उनका दुर्बल शरीर भूख-प्यास से व्याकुल हो उठा। रात भर सब जागरण करते रहे, और शोभन की साँसें धीमी होती गईं। सूर्योदय होते-होते शोभन का शरीर शांत हो गया।

राजा मुचुकुंद ने शोभन का विधिपूर्वक अंतिम संस्कार कराया। चंद्रभागा पिता के घर ही रहकर पूरी श्रद्धा से भगवान की पूजा और एकादशी व्रत करती रही।

उधर, रमा एकादशी के व्रत के प्रभाव से शोभन को मंदराचल पर्वत पर एक दिव्य देवपुर का राज्य मिला। सोने-रत्नों से जड़ा महल, गंधर्व और अप्सराएँ सेवा में, वे वहाँ इंद्र की तरह विराजते थे।

एक दिन मुचुकुंद के नगर का सोमशर्मा नाम का ब्राह्मण तीर्थयात्रा करते हुए वहाँ पहुँचा। उसने शोभन को पहचान लिया। शोभन ने आदर से उसका स्वागत किया और ससुराल वालों का कुशल पूछा।

सोमशर्मा ने पूछा, “राजन, आपको यह अद्भुत राज्य कैसे मिला?” शोभन बोले, “यह रमा एकादशी के व्रत का फल है। पर यह राज्य अस्थिर है, क्योंकि मैंने वह व्रत पूरी श्रद्धा से नहीं, विवशता में किया था। आप चंद्रभागा को यह सब बताइए। वही इसे स्थिर कर सकती है।”

सोमशर्मा ने लौटकर चंद्रभागा को सब कुछ बताया। चंद्रभागा आनंद से भर उठी और बोली, “मुझे मेरे स्वामी के पास ले चलिए।”

सोमशर्मा उसे मंदराचल के पास वामदेव ऋषि के आश्रम ले गए। ऋषि के मंत्रों और अपने एकादशी व्रतों के पुण्य से चंद्रभागा का शरीर दिव्य हो गया, और वह शोभन के पास पहुँची।

चंद्रभागा ने पति से कहा, “स्वामी, आठ वर्ष की आयु से मैं श्रद्धा से हर एकादशी का व्रत करती आई हूँ। वह सारा पुण्य मैं आपको अर्पित करती हूँ।” उसी क्षण शोभन का राज्य स्थिर और अटल हो गया।

दोनों उस दिव्य नगर में सुखपूर्वक रहने लगे। श्रीकृष्ण ने कहा, “राजन, रमा एकादशी का व्रत करने वाले और इसकी कथा सुनने वाले को भी शुभ फल प्राप्त होता है।”

इस कथा का संदेश

विवशता में किया पुण्य भी फल देता है, पर श्रद्धा से किया पुण्य ही अटल होता है। और जीवनसाथी की सच्ची निष्ठा भाग्य को भी स्थिर कर देती है।

रमा एकादशी कार्तिक कृष्ण पक्ष में, दीपावली से कुछ दिन पहले आती है। इस दिन भगवान विष्णु के साथ माता लक्ष्मी (रमा) की पूजा, उपवास और रात्रि जागरण की परंपरा है, और द्वादशी को पारण किया जाता है। एकादशी व्रत कथाओं का स्रोत अलग-अलग ग्रंथों में बताया जाता है; यह कथा परंपरा से ब्रह्मवैवर्त पुराण की मानी जाती है।

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