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विजयादशमी: राम द्वारा देवी की आराधना और रावण वध
स्रोत: देवी आराधना (अकाल बोधन): कृत्तिवासी रामायण (बांग्ला परंपरा); रावण वध: वाल्मीकि रामायण, युद्ध कांड
लंका का युद्ध अपने अंतिम चरण में था। कुंभकर्ण और मेघनाद जैसे महावीर मारे जा चुके थे। अब रावण स्वयं युद्धभूमि में था, और उसे हराना सहज नहीं लग रहा था।
बांग्ला भाषा में कवि कृत्तिवास की लिखी रामायण में एक प्रसंग आता है, जो वाल्मीकि रामायण में नहीं है। इसके अनुसार विजय के लिए श्रीराम ने देवी दुर्गा की आराधना करने का निश्चय किया।
पर समय शरद ऋतु का था, जब परंपरा के अनुसार देवता विश्राम में होते हैं। देवी की पूजा का यह समय नहीं था। फिर भी श्रीराम ने असमय ही देवी का आवाहन किया। इसी को अकाल बोधन कहते हैं, यानी असमय जगाना।
पूजा के लिए 108 नीले कमल चाहिए थे। हनुमान दूर के एक सरोवर से 108 कमल ले आए। श्रीराम ने पूरी श्रद्धा से पूजा आरंभ की, और एक-एक मंत्र के साथ एक-एक कमल देवी के चरणों में अर्पित करने लगे।
एक, दो, दस, पचास, सौ… पूजा अपने अंत की ओर बढ़ रही थी। श्रीराम का मन देवी में डूबा था।
पर जब अंतिम कमल चढ़ाने के लिए उन्होंने हाथ बढ़ाया, तो थाल खाली था। गिनती में एक कमल कम था। कथा कहती है कि देवी ने स्वयं श्रीराम की परीक्षा लेने के लिए एक कमल छिपा लिया था।
पूजा अधूरी नहीं छोड़ी जा सकती थी। नया कमल लाने का समय भी नहीं था। श्रीराम एक पल ठहरे। फिर उन्हें याद आया कि लोग उन्हें कमलनयन कहते हैं, यानी कमल जैसे नेत्रों वाले। उन्होंने तरकश से एक बाण निकाला…
श्रीराम ने निश्चय किया कि अंतिम कमल के स्थान पर वे अपना एक नेत्र देवी को अर्पित करेंगे। जैसे ही उन्होंने बाण उठाया, देवी दुर्गा स्वयं प्रकट हुईं और उनका हाथ थाम लिया।
देवी ने कहा, “राम, मैं तुम्हारी भक्ति से प्रसन्न हूँ। तुम्हारी परीक्षा पूरी हुई। जाओ, युद्ध में तुम्हारी विजय होगी।” यहीं कृत्तिवासी रामायण का यह प्रसंग पूरा होता है। बंगाल की दुर्गा पूजा इसी अकाल बोधन की स्मृति से जुड़ी है।
अब वाल्मीकि रामायण के युद्ध कांड की कथा। राम और रावण का युद्ध चल रहा था, और श्रीराम थके हुए थे। तब महर्षि अगस्त्य वहाँ आए और उन्हें आदित्य हृदय स्तोत्र का उपदेश दिया, सूर्य देव की स्तुति, जिससे शत्रु पर विजय मिलती है। श्रीराम ने तीन बार उसका जप किया और नए उत्साह से भर उठे।
इंद्र ने अपने सारथी मातलि के साथ अपना दिव्य रथ श्रीराम के लिए भेजा। दोनों वीरों में ऐसा युद्ध हुआ जिसकी कोई उपमा नहीं थी। श्रीराम ने बाण से रावण का सिर काटा, पर उसकी जगह नया सिर उग आया। फिर काटा, फिर उग आया। ऐसा बार-बार हुआ।
तब मातलि ने याद दिलाया, “प्रभु, क्या आप भूल गए? इसके वध के लिए ब्रह्मास्त्र चलाइए।” श्रीराम ने वह ब्रह्मास्त्र उठाया जो उन्हें महर्षि अगस्त्य ने दिया था। उसके वेग में वायु थी, नोक पर अग्नि और सूर्य, और भार में मेरु और मंदर पर्वत।
श्रीराम ने मंत्र पढ़कर वह बाण छोड़ा। वह रावण की छाती में लगा, उसका हृदय भेदकर निकल गया और फिर लौटकर श्रीराम के तरकश में आ गया। रावण के हाथ से धनुष छूट गया, और वह रथ से धरती पर गिर पड़ा।
आकाश से फूल बरसे, देवताओं ने दुंदुभियाँ बजाईं। वायु सुगंधित होकर बहने लगी, और सूर्य निर्मल प्रकाश से चमक उठा। अधर्म पर धर्म की विजय हो चुकी थी।
इस कथा का संदेश
विजय पहले भीतर जीती जाती है, समर्पण और धैर्य से; फिर बाहर का युद्ध जीता जाता है। विजयादशमी इसी धर्म की जीत का उत्सव है।
आश्विन शुक्ल दशमी को विजयादशमी (दशहरा) मनाई जाती है। रावण वध को इस तिथि से जोड़ना परंपरा है; वाल्मीकि रामायण में तिथि का उल्लेख नहीं है। अकाल बोधन और 108 कमलों की कथा कृत्तिवासी रामायण की है; हिंदी में इसे निराला की कविता “राम की शक्ति-पूजा” ने भी प्रसिद्ध किया।
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