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अजामिल की कथा
स्रोत: श्रीमद्भागवत महापुराण, षष्ठ स्कंध, अध्याय 1–3
कान्यकुब्ज नगर में अजामिल नाम का एक ब्राह्मण रहता था। युवावस्था में वह शास्त्रों का अध्ययन करता, विनम्र था, सत्य बोलता था और माता-पिता, गुरु और अतिथियों की सेवा करता था।
एक दिन पिता की आज्ञा से वह वन से फल, फूल, समिधा और कुशा लेने गया। लौटते समय उसने नशे में डूबे एक व्यक्ति को एक दासी के साथ निर्लज्ज व्यवहार करते देखा।
वह दृश्य उसके मन में ऐसा बैठ गया कि वह अपने संस्कार भूल बैठा। धीरे-धीरे उसने अपनी पत्नी को छोड़ दिया और उसी दासी के साथ रहने लगा।
परिवार पालने के लिए वह जुआ, छल और चोरी जैसे काम करने लगा। जो कभी धर्म का पालन करता था, उसका पूरा जीवन अब गलत रास्ते पर चल पड़ा।
उस दासी से उसके दस पुत्र हुए। सबसे छोटा बेटा उसे प्राणों से प्यारा था। उसका नाम था नारायण। अजामिल दिन भर उसी को पुकारता, उसी को खिलाता, उसी की तोतली बातों में खोया रहता।
इसी तरह अट्ठासी वर्ष बीत गए, और एक दिन उसका अंत समय आ पहुँचा। उसने देखा, हाथों में पाश लिए तीन विकराल यमदूत उसे ले जाने आए हैं।
घबराकर अजामिल ने पास खेलते अपने छोटे बेटे को पुकारा, “नारायण! नारायण!” उसी क्षण भगवान विष्णु के तेजस्वी पार्षद वहाँ प्रकट हुए और उन्होंने यमदूतों को कड़े स्वर में रोका, “ठहरो!”
यमदूत चकित रह गए। “आप कौन हैं, जो धर्मराज की आज्ञा में बाधा डाल रहे हैं? इस व्यक्ति ने जीवन भर पाप किए हैं, इसे अपने कर्मों का फल मिलना ही चाहिए।”
विष्णु के पार्षदों ने उत्तर दिया, “इसने जीवन भर जो भी भूलें कीं, उन सबका प्रायश्चित उसी क्षण हो गया, जब इसने विवश होकर भगवान का नाम नारायण लिया। जो भगवान का नाम लेता है, उसकी रक्षा का भार स्वयं भगवान अपने ऊपर ले लेते हैं।”
“भगवान का नाम चाहे पुत्र को पुकारते हुए लिया जाए, हँसी में, गीत में या पीड़ा में, वह पापों को वैसे ही जला देता है जैसे आग सूखे ईंधन को। जैसे अनजाने में पी गई अमृत-औषधि भी अपना गुण दिखाती है, वैसे ही नाम का प्रभाव होता है।”
इतना कहकर उन्होंने अजामिल को यमदूतों के पाश से छुड़ा दिया। यमदूत लौटकर धर्मराज के पास गए। धर्मराज ने उन्हें समझाया कि भगवान का नाम लेने वाले भक्तों के पास कभी मत जाना, वे स्वयं भगवान की शरण में हैं।
अजामिल ने यह सारा संवाद सुना था। होश आते ही उसे अपने जीवन पर गहरा पश्चाताप हुआ: “मैंने अपना कितना जीवन व्यर्थ गँवा दिया! फिर भी भगवान ने मुझ जैसे को एक और अवसर दिया है।”
उसने सारे मोह छोड़ दिए और गंगाद्वार, यानी हरिद्वार, जाकर एकाग्र मन से भगवान की भक्ति में लीन हो गया।
कुछ समय बाद वही पार्षद फिर उसके सामने आए। अजामिल ने गंगा तट पर शांति से शरीर त्यागा और उनके साथ स्वर्णिम विमान में बैठकर भगवान के धाम को चला गया।
इस कथा का संदेश
कोई कितना भी भटक जाए, लौटने का रास्ता कभी बंद नहीं होता। भगवान का नाम और सच्चा पश्चाताप जीवन की दिशा बदल सकते हैं।
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