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धनतेरस: राजा हिम के पुत्र और यम दीपदान
स्रोत: लोक प्रचलित कथा (धनतेरस, यम दीपदान)
बहुत पहले हिम नाम के एक राजा थे। लंबी प्रतीक्षा के बाद उनके घर पुत्र का जन्म हुआ। राजमहल में उत्सव मनाया गया, और ज्योतिषियों को बालक की कुंडली देखने बुलाया गया।
ज्योतिषियों ने कुंडली देखी तो उनके चेहरे उतर गए। बहुत आग्रह करने पर उन्होंने धीरे से कहा, “राजन, यह बालक गुणवान होगा, पर इसके विवाह के चौथे दिन इसे सर्पदंश का योग है।”
राजा-रानी का हृदय बैठ गया। उन्होंने राजकुमार को बड़े जतन से पाला। समय आया तो उसका विवाह एक बुद्धिमती और धर्मपरायण राजकुमारी से हुआ। राजकुमारी को भी यह बात बताई गई।
नववधू घबराई नहीं। उसने मन ही मन ठान लिया: “मैं वह रात अपने पति को सोने नहीं दूँगी, और अँधेरे को घर में आने नहीं दूँगी।”
चौथे दिन की शाम उसने अपने सारे गहने, सोने-चाँदी के सिक्के और आभूषण शयनकक्ष के द्वार पर ढेर बनाकर रख दिए। पूरे महल में, आँगन में, द्वार पर, हर कोने में दीपक जला दिए। चारों ओर ऐसा उजाला हुआ मानो दिन निकल आया हो।
फिर वह पति के पास बैठ गई और उन्हें कहानियाँ सुनाने लगी, मधुर गीत गाने लगी, ताकि उन्हें नींद न आए। रात गहराती गई…
आधी रात को द्वार पर एक हल्की-सी सरसराहट हुई। स्वयं यमराज सर्प का रूप धरकर राजकुमार के प्राण लेने आ पहुँचे थे।
सर्प ने भीतर जाना चाहा, पर द्वार पर जगमगाते दीपों और सोने-चाँदी के ढेर की चमक से उसकी आँखें चौंधिया गईं। उजाला इतना था कि उसे आगे का रास्ता ही न सूझा।
वह आभूषणों के उस ढेर पर चढ़कर बैठ गया। भीतर से राजकुमारी के मधुर गीत और कहानियाँ सुनाई दे रही थीं। सर्प वहीं बैठा उन्हें सुनता रहा, सुनता रहा…
पूरी रात इसी तरह बीत गई। राजकुमारी एक पल को भी नहीं रुकी, और राजकुमार एक पल को भी नहीं सोए। दीपक भी रात भर जलते रहे।
पौ फटी, सूर्य की पहली किरण आई, और वह घड़ी बीत गई। यमराज चुपचाप लौट गए। राजकुमार के प्राण बच गए।
सुबह राजमहल में आनंद छा गया। राजा हिम ने पुत्रवधू को आशीर्वाद दिया, जिसकी सूझ-बूझ, धैर्य और दीपों के प्रकाश ने उनके कुल का दीपक बुझने नहीं दिया। राजकुमार ने भी अपनी पत्नी के प्रति कृतज्ञता से हाथ जोड़ दिए। उस रात ने दिखा दिया था कि प्रेम, धैर्य और विवेक मिलकर कितने बड़े संकट को टाल सकते हैं।
कथा कहती है कि उस दिन कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी थी। तभी से इस दिन संध्या को घर के द्वार पर यमराज के नाम का दीपक जलाने की परंपरा चली, जिसे यम दीपदान कहते हैं।
यह दीपक दक्षिण दिशा की ओर मुख करके रखा जाता है, क्योंकि दक्षिण यम की दिशा मानी जाती है। इस दीप के साथ परिवार के सभी सदस्यों के उत्तम स्वास्थ्य और दीर्घायु की प्रार्थना की जाती है।
और जिस तरह उस रात सोने-चाँदी के ढेर ने द्वार की शोभा बढ़ाई थी, उसी तरह धनतेरस पर नए बर्तन, सोना-चाँदी खरीदने की परंपरा भी मंगल का प्रतीक बन गई।
इस कथा का संदेश
अँधेरे से डरने की जगह दीप जलाइए। धैर्य, सूझ-बूझ और जागरूकता से कठिन घड़ी भी मंगल में बदल जाती है।
धनतेरस की संध्या को घर के मुख्य द्वार के बाहर दक्षिण की ओर मुख करके आटे या मिट्टी का चौमुखा दीपक जलाया जाता है, जिसे यम दीपदान कहते हैं। यह कथा लोक परंपरा में प्रचलित है; कुछ रूपों में राजकुमार की नववधू दीपों के साथ पूरी रात भजन गाती है, और कुछ में यम दूत कथा सुनाते हैं कि यह दीपदान अकाल मृत्यु के भय को दूर करता है।
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