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गजेंद्र मोक्ष
स्रोत: श्रीमद्भागवत पुराण, अष्टम स्कंध (अध्याय 2–4)
क्षीरसागर के बीच त्रिकूट नाम का एक सुंदर पर्वत था। उसकी घाटी में वरुण देव का एक उद्यान था, और उद्यान में कमलों से भरा एक विशाल सरोवर।
उसी पर्वत के वनों में हाथियों का राजा गजेंद्र रहता था। बलवान, निडर, अपने बड़े परिवार और झुंड का स्वामी। एक दिन धूप से थककर वह हथिनियों और बच्चों के साथ उस सरोवर में उतरा। सूँड़ में जल भरकर उसने सबको नहलाया, खूब खेला।
तभी जल में छिपे एक बलवान ग्राह (मगर) ने उसका पैर पकड़ लिया।
गजेंद्र ने पूरी शक्ति से खींचा। ग्राह ने भी उसे भीतर खींचा। हथिनियाँ और साथी हाथी चिंघाड़ते रहे, पर कोई उसे छुड़ा न सका। जल में ग्राह का बल बढ़ता गया, और गजेंद्र का घटता गया। भागवत कहता है कि यह संघर्ष एक हज़ार वर्ष तक चला।
आख़िर वह क्षण आया जब गजेंद्र की सारी शक्ति चुक गई। परिवार साथ नहीं दे सका, अपना बल काम नहीं आया। तब उसके मन में एक विचार उठा: “जिनसे मृत्यु भी डरती है, जो सबके आश्रय हैं, अब मैं केवल उन्हीं की शरण लूँगा।”
पूर्व जन्म के पुण्य से उसे एक स्तुति याद आई। उसने मन को एकाग्र किया और उस परम पुरुष को पुकारा, जिसका न कोई नाम है, न रूप, फिर भी जो सबमें है।
जल में डूबते हुए गजेंद्र ने पूरे मन से पुकारा: “जिनमें यह सारा जगत है, जिनसे यह जन्मा है, जो स्वयं यह सब हैं, उन स्वयंभू भगवान की मैं शरण लेता हूँ।”
गजेंद्र ने किसी एक देवता का नाम लेकर नहीं, परम सत्य को पुकारा था। इसलिए ब्रह्मा आदि देवता नहीं आए, क्योंकि वह उन्हें विशेष रूप से नहीं पुकार रहा था। पर सबके हृदय में रहने वाले भगवान श्रीहरि ने वह पुकार सुनी।
वे तुरंत गरुड़ पर बैठे और हाथ में चक्र लिए वहाँ पहुँचे। आकाश में भगवान को देखकर पीड़ा से व्याकुल गजेंद्र ने सूँड़ से सरोवर का एक कमल तोड़कर ऊँचा उठाया और कठिनाई से कहा, “नारायण, जगद्गुरु, भगवन्, आपको नमस्कार।”
भगवान की करुणा इतनी थी कि वे गरुड़ से उतर पड़े। उन्होंने गजेंद्र और ग्राह, दोनों को एक साथ सरोवर से बाहर खींचा, और सुदर्शन चक्र से ग्राह का मुँह चीरकर गजेंद्र को छुड़ा लिया।
उसी क्षण एक चमत्कार हुआ। ग्राह के शरीर से एक दिव्य गंधर्व निकला। वह हूहू नाम का गंधर्व था, जिसे देवल ऋषि ने शाप दिया था। भगवान के स्पर्श से वह शाप से मुक्त हुआ, भगवान को प्रणाम कर अपने लोक चला गया।
और गजेंद्र? वह पूर्व जन्म में पांड्य देश का राजा इंद्रद्युम्न था, भगवान का बड़ा भक्त। एक दिन वह मौन व्रत लेकर पूजा में बैठा था, तभी अगस्त्य ऋषि आए। राजा उठकर उनका स्वागत नहीं कर सका। ऋषि ने इसे अहंकार समझकर शाप दिया, “तुम्हारी बुद्धि हाथी जैसी जड़ है, जाओ हाथी बनो।”
उसी शाप से वह हाथी बना, पर पिछले जन्म की भक्ति उसके भीतर बची रही। इसीलिए संकट के क्षण में वह स्तुति उसे याद आई। भगवान के स्पर्श से उसका अज्ञान मिट गया, और उसे भगवान का पार्षद रूप मिला।
भगवान ने कहा, “जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर इस कथा और गजेंद्र की स्तुति का स्मरण करेगा, अंत समय में मैं उसे निर्मल बुद्धि दूँगा।” फिर वे गजेंद्र को साथ लेकर अपने धाम चले गए।
इस कथा का संदेश
जब परिवार, बल और सारे सहारे थक जाएँ, तब भी एक सहारा बचा रहता है। सच्चे मन से की गई एक पुकार भगवान तक अवश्य पहुँचती है।
भागवत के इस प्रसंग में गजेंद्र की स्तुति (गजेंद्र स्तुति या गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र) बहुत से भक्त प्रतिदिन, विशेषकर संकट के समय, पढ़ते हैं।
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