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हनुमान और संजीवनी

स्रोत: वाल्मीकि रामायण, युद्ध कांड (सर्ग 73–74; दूसरा प्रसंग सर्ग 101–102)

लंका का युद्ध अपने भीषण दौर में था। रावण के पुत्र इंद्रजित ने अदृश्य होकर ब्रह्मास्त्र चलाया। बाणों की ऐसी वर्षा हुई कि राम और लक्ष्मण अचेत होकर गिर पड़े, और उनके साथ वानर सेना के असंख्य वीर भी।

रात हुई। रणभूमि पर सन्नाटा था। केवल दो योद्धा बचे थे जो खड़े हो सकते थे: विभीषण और हनुमान। दोनों मशालें लेकर घायलों के बीच घूमने लगे।

उन्हें वृद्ध रीछराज जाम्बवान मिले, बाणों से बिंधे हुए, आँखें तक खोल नहीं पा रहे थे। विभीषण की आवाज़ पहचानकर उन्होंने पहला प्रश्न पूछा, “क्या पवनपुत्र हनुमान जीवित हैं?”

विभीषण चकित हुए: “आपने राम-लक्ष्मण के बारे में नहीं, हनुमान के बारे में पूछा?” जाम्बवान बोले, “यदि हनुमान जीवित हैं, तो यह मरी हुई सेना भी जीवित है। और यदि वे नहीं, तो हम जीते हुए भी मरे हुए हैं।”

हनुमान ने आगे बढ़कर प्रणाम किया। जाम्बवान ने कहा, “वत्स, समुद्र पार कर हिमालय जाओ। वहाँ ऋषभ और कैलास शिखरों के बीच औषधियों का एक पर्वत चमकता है। उस पर चार औषधियाँ हैं: मृतसंजीवनी, विशल्यकरणी, सावर्ण्यकरणी और संधानी। उन्हें ले आओ।”

हनुमान ने विशाल रूप धारण किया और एक ही छलांग में आकाश में उड़ चले। समुद्र, नगर, नदियाँ, वन पीछे छूटते गए, और वे हिमालय जा पहुँचे।

वहाँ औषधियों का पर्वत दिखा। पर जैसे ही हनुमान उसके पास पहुँचे, औषधियों को पता चल गया कि कोई उन्हें लेने आया है। वे अचानक छिप गईं, और पूरा पर्वत सामान्य दिखने लगा।

हनुमान ने औषधियों को खोजा, पर वे दिखाई नहीं दीं। उनका धैर्य क्रोध में बदल गया। उन्होंने पर्वत से कहा, “क्या तुम श्रीराम पर भी दया नहीं करोगे? तो देखो, आज मैं तुम्हें ही उखाड़ ले चलता हूँ।”

और उन्होंने औषधियों से भरा वह पूरा शिखर, उसके वृक्षों, धातुओं और चमकती औषधियों समेत, जड़ से उखाड़ लिया। उसे हाथ पर उठाकर वे फिर आकाश में उड़ चले, मानो दूसरा सूर्य आकाश में चल रहा हो।

जब हनुमान लंका के पास रणभूमि पर पहुँचे, तो औषधियों की सुगंध हवा में फैल गई। केवल उस सुगंध से ही चमत्कार होने लगा।

राम और लक्ष्मण जाग उठे, जैसे नींद से उठे हों। वानरों के शरीर से बाण अपने आप निकल गए, घाव भर गए, और जो वीर अचेत पड़े थे, वे फिर उठ खड़े हुए। सेना में जयजयकार गूँज उठा।

वाल्मीकि बताते हैं कि राक्षसों में कोई नहीं उठा, क्योंकि रावण के आदेश से उनके मृत योद्धाओं को पहले ही समुद्र में डाल दिया गया था।

काम पूरा होते ही हनुमान उस शिखर को फिर हिमालय ले गए, उसे उसकी जगह लौटाया, और श्रीराम के पास वापस आ गए।

रामायण में यह पर्वत एक बार और आता है। आगे चलकर जब रावण की शक्ति से लक्ष्मण मूर्छित हुए, तो वानर वैद्य सुषेण ने हनुमान से वही औषधियाँ लाने को कहा। इस बार भी हनुमान औषधियों को पहचान न सके, और पूरा शिखर ही उठा लाए।

सुषेण ने औषधि कूटकर लक्ष्मण को सुँघाई। बाण निकल गए, पीड़ा मिट गई, और लक्ष्मण उठ खड़े हुए। श्रीराम ने भाई को हृदय से लगा लिया। दोनों बार, जब सब रास्ते बंद दिखे, हनुमान की भक्ति और साहस ने ही राह खोली।

इस कथा का संदेश

जाम्बवान ने हनुमान में सेना का प्राण देखा। सच्चा सेवक वही है जो रास्ता बंद दिखे तो भी हार न माने, और पूरा पर्वत उठाने का साहस रखे।

लोक में प्रसिद्ध संजीवनी कथा, जिसमें लक्ष्मण मेघनाद की शक्ति से मूर्छित होते हैं, सूर्योदय से पहले लौटने की शर्त, कालनेमि राक्षस और अयोध्या के ऊपर भरत के बाण का प्रसंग आता है, मुख्य रूप से गोस्वामी तुलसीदास के रामचरितमानस (लंका कांड) और बाद की परंपरा से है। यहाँ वाल्मीकि रामायण का वर्णन दिया गया है।

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