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महागौरी
स्रोत: प्रचलित नवदुर्गा कथा (लोक परंपरा); पार्वती की तपस्या का आधार: शिव पुराण, रुद्र संहिता, पार्वती खंड
शिव को पति रूप में पाने के लिए हिमालय की पुत्री पार्वती ने राजमहल का सुख छोड़ दिया और वन में तपस्या करने लगीं। उनका निश्चय था: या तो शिव मिलेंगे, या यह जीवन तप में ही बीतेगा।
दिन महीने बने, महीने बरस। गर्मी की तपती धूप में वे चारों ओर अग्नि जलाकर बैठतीं। वर्षा में खुले आकाश के नीचे भीगती रहतीं। सर्दियों की रातों में बर्फ़ीले जल में खड़ी होकर शिव का नाम जपतीं।
पहले फल, फिर सूखे पत्ते, और अंत में वे भी छोड़ दिए। केवल वायु और शिव का स्मरण। उनके चारों ओर धूल, मिट्टी और पत्तों की परत जमती गई, पर उनका ध्यान नहीं टूटा।
जिस राजकुमारी का रूप कभी चंद्रमा जैसा उजला था, उसका शरीर अब धूप, धूल और कठोर तप से श्याम पड़ गया था। शरीर दुर्बल हो गया था, पर आँखों में वही अडिग निष्ठा चमक रही थी।
उनकी तपस्या का ताप तीनों लोकों तक पहुँचने लगा। देवता चकित थे। ऋषि-मुनि उनकी परीक्षा लेने आए और लौट गए, पर पार्वती अपने संकल्प से नहीं हटीं।
अंत में वह क्षण आया जिसकी प्रतीक्षा में युग बीत गए थे। भगवान शिव स्वयं उनके सामने प्रकट हुए। उन्होंने कहा, “देवी, तुम्हारी तपस्या पूरी हुई। मैं तुम्हें पत्नी रूप में स्वीकार करता हूँ।”
फिर शिव ने तप से श्याम और क्षीण हुए उस शरीर को करुणा से देखा, और अपनी जटाओं से बहती गंगा की ओर हाथ बढ़ाया…
प्रचलित कथा के अनुसार शिव ने अपनी जटाओं से निकलती पवित्र गंगा के जल से पार्वती को स्नान कराया। जैसे ही वह निर्मल धारा उनके शरीर पर पड़ी, तपस्या की सारी धूल और कालिमा धुल गई।
पार्वती का शरीर बिजली की तरह दमक उठा। उनका रंग शंख, चंद्रमा और कुंद के फूल जैसा उज्ज्वल हो गया। उनकी यह कांति देखकर देवता भी विस्मित रह गए। शिव ने प्रसन्न होकर देवी को उनके इसी उज्ज्वल रूप में अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार किया, और आगे हिमालय में शिव-पार्वती का विवाह हुआ।
इस अत्यंत गौर, उज्ज्वल रूप के कारण देवी महागौरी कहलाईं। परंपरा कहती है कि महागौरी सदा श्वेत वस्त्र और श्वेत आभूषण धारण करती हैं, इसलिए उन्हें श्वेतांबरधरा भी कहते हैं। परंपरा में उनकी आयु आठ वर्ष की मानी गई है।
उनकी चार भुजाएँ हैं। एक हाथ में त्रिशूल, एक में डमरू, और बाकी दो अभय और वर मुद्रा में। उनका वाहन वृषभ यानी बैल है। उनका स्वभाव अत्यंत शांत और करुणामय माना जाता है।
कथा का भाव यह है कि कठोर तप ने जो श्यामलता दी थी, वह कोई दोष नहीं थी, तप का चिह्न थी। और जब तप पूरा हुआ, तो उसी तप ने देवी को पहले से भी अधिक उज्ज्वल बना दिया।
कुछ पुराणों में एक अलग कथा भी मिलती है, जिसमें पार्वती तपस्या करके गौर वर्ण प्राप्त करती हैं और उनके शरीर के श्याम कोश से एक अलग देवी प्रकट होती हैं। ये अलग-अलग परंपराएँ हैं, और सबका सार एक है: तप से देवी का तेज और निखरता है।
भक्त मानते हैं कि माँ महागौरी की उपासना से मन के पुराने कलुष धुल जाते हैं और जीवन में पवित्रता और शांति आती है।
इस कथा का संदेश
कठिन तप के निशान दोष नहीं होते। धैर्य से पूरा किया गया तप अंत में जीवन को और उज्ज्वल बना देता है।
शारदीय और चैत्र नवरात्रि के आठवें दिन, दुर्गाष्टमी को, माँ महागौरी की पूजा होती है। इस दिन कई घरों में कन्या पूजन किया जाता है। गंगाजल से स्नान वाली कथा प्रचलित परंपरा से है।
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