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मत्स्य अवतार और मनु
स्रोत: श्रीमद्भागवत महापुराण, अष्टम स्कंध, अध्याय 24 (मत्स्य पुराण में भी)
बहुत पुराने समय की बात है। द्रविड़ देश के राजा सत्यव्रत बड़े धर्मात्मा थे। वे तप में लीन रहते थे और केवल जल पीकर जीवन बिताते थे।
एक दिन वे कृतमाला नदी में खड़े होकर पितरों को जल अर्पित कर रहे थे। जैसे ही उन्होंने अंजलि में जल उठाया, उसमें एक नन्ही-सी मछली आ गई।
राजा उसे वापस नदी में छोड़ने लगे, तो मछली बोल उठी, “राजन, आप तो दीनों पर दया करते हैं। इस नदी के बड़े जीव मुझे खा जाएँगे। मुझे यहाँ मत छोड़िए।”
राजा का हृदय पिघल गया। उन्होंने मछली को अपने कमंडलु में रख लिया और आश्रम ले आए।
पर एक ही रात में मछली इतनी बढ़ गई कि कमंडलु छोटा पड़ गया। “मुझे कोई बड़ा स्थान दीजिए।” राजा ने उसे एक बड़े पात्र में रखा, वह उसमें भी न समाई। सरोवर में डाला, तो पल भर में सरोवर भर गया। बड़े-बड़े जलाशय भी उसके लिए छोटे पड़ते गए।
अंत में राजा उसे समुद्र तक ले गए। मछली ने फिर कहा, “वीर, यहाँ बड़े-बड़े मगर रहते हैं। मुझे समुद्र में मत छोड़िए।”
राजा ठिठक गए। जो मछली एक दिन में सरोवरों को भर दे, वह साधारण जीव नहीं हो सकती। उन्होंने हाथ जोड़कर पूछा, “आप कौन हैं, जो मछली का रूप धरकर हमें मोह में डाल रहे हैं?”
फिर राजा ने स्वयं ही कहा, “ऐसी लीला तो केवल भगवान नारायण की हो सकती है। प्रभु, आपने यह रूप क्यों धारण किया है?” तब मत्स्य रूप में भगवान श्रीहरि बोले:
“आज से सातवें दिन तीनों लोक प्रलय के समुद्र में डूब जाएँगे। उस समय मेरी भेजी हुई एक विशाल नौका तुम्हारे पास आएगी। सब प्रकार की औषधियाँ और छोटे-बड़े बीज लेकर, सप्तर्षियों और सब प्रकार के प्राणियों के साथ उस पर चढ़ जाना। जब प्रचंड हवा से नौका डगमगाने लगे, तब मैं आऊँगा। नौका को महासर्प वासुकि से मेरे सींग में बाँध देना।”
इतना कहकर भगवान अंतर्धान हो गए। सत्यव्रत कुशा बिछाकर, पूर्व की ओर मुख करके बैठ गए और भगवान का ध्यान करते हुए उस दिन की प्रतीक्षा करने लगे।
सातवाँ दिन आया। आकाश में घने बादल उमड़े, मूसलाधार वर्षा होने लगी और समुद्र अपनी सीमाएँ तोड़कर धरती को डुबोने लगा। तभी वह नौका आई। राजा औषधियों, बीजों और ऋषियों के साथ उस पर चढ़ गए।
ऋषियों ने कहा, “राजन, भगवान केशव का ध्यान करो। वही हमें इस संकट से पार करेंगे।” ध्यान करते ही उस अथाह जल में एक सुनहरी, एक सींग वाली, लाख योजन लंबी विशाल मछली प्रकट हुई। राजा ने भगवान के कहे अनुसार नौका को वासुकि से उस सींग में बाँध दिया।
प्रलय की उस लंबी रात में भगवान मत्स्य नौका को खींचते हुए जल में विचरते रहे। राजा ने उनकी स्तुति की, और भगवान ने उन्हें आत्मा और परमात्मा का दिव्य ज्ञान दिया, जो मत्स्य पुराण के नाम से जाना जाता है।
भागवत यह भी बताता है कि पिछले कल्प के अंत में जब ब्रह्मा जी को नींद आई, तब उनके मुख से निकले वेदों को हयग्रीव नाम का दानव चुरा ले गया था। मत्स्य भगवान ने उस दानव का वध किया और ब्रह्मा जी के जागने पर वेद उन्हें लौटा दिए।
वही राजा सत्यव्रत इस कल्प में सूर्यपुत्र वैवस्वत मनु बने, जिनसे आगे मनुष्यों की संतति चली।
इस कथा का संदेश
जो एक नन्हे जीव की पुकार पर भी दया करता है, उसकी नौका के खेवनहार स्वयं भगवान बनते हैं। सच्ची करुणा ही सबसे बड़े तूफ़ान में सहारा बनती है।
चैत्र शुक्ल तृतीया को मत्स्य जयंती मनाई जाती है। यही कथा महाभारत (वन पर्व) और शतपथ ब्राह्मण में भी आती है; वहाँ राजा को सीधे मनु कहा गया है और अंत में नौका हिमालय के एक शिखर से बाँधी जाती है।
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