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श्रवण कुमार और दशरथ का शाप
स्रोत: वाल्मीकि रामायण, अयोध्या कांड, सर्ग 63–64
राम के वन जाने के छठे दिन की रात थी। अयोध्या के महल में राजा दशरथ पुत्र-वियोग में तड़प रहे थे। आधी रात को उन्होंने रानी कौसल्या से कहा, “आज मुझे अपना एक पुराना कर्म याद आ रहा है। मनुष्य जैसा करता है, वैसा ही पाता है।”
“बहुत पहले, जब मैं युवराज था और तुमसे मेरा विवाह भी नहीं हुआ था, तब मैं शब्दवेधी बाण चलाने के लिए प्रसिद्ध था: केवल आवाज़ सुनकर निशाना लगा सकता था।”
“वर्षा ऋतु थी। एक रात मैं सरयू के किनारे शिकार के लिए गया। अँधेरे में नदी से आवाज़ आई, जैसे कोई हाथी पानी पी रहा हो। मैंने बिना देखे उस आवाज़ की ओर बाण छोड़ दिया।”
“तभी एक मनुष्य की दर्द भरी पुकार उठी: ‘हाय! मुझ निरपराध तपस्वी पर किसने बाण चलाया? मैं तो रात में नदी से जल भरने आया था।’ वह आवाज़ हाथी की नहीं, घड़े में भरते पानी की थी।”
“मैं काँपता हुआ वहाँ पहुँचा। एक युवा तपस्वी बाण से बिंधा पड़ा था, पास में जल का घड़ा। उसने कहा, ‘मेरे अंधे, बूढ़े माता-पिता प्यासे बैठे मेरी राह देख रहे हैं। जाओ, उन्हें सब सच बता दो। और यह बाण निकाल दो।’ बाण निकलते ही उसने प्राण त्याग दिए।”
“घड़ा भरकर मैं उस आश्रम में पहुँचा। दो वृद्ध, अंधे तपस्वी पंख कटे पक्षियों की तरह असहाय बैठे थे। मेरे कदमों की आहट सुनकर पिता बोले, ‘बेटा, इतनी देर क्यों लगाई? कुछ बोलते क्यों नहीं?’”
“मैंने काँपते स्वर में कहा, ‘मैं आपका पुत्र नहीं, क्षत्रिय दशरथ हूँ। मुझसे अनजाने में बड़ा पाप हुआ है। हाथी समझकर मैंने आपके पुत्र पर बाण चला दिया।’”
“वृद्ध पिता शोक से व्याकुल हो उठे। उन्होंने कहा, ‘यदि तुम स्वयं आकर यह सच न बताते, तो तुम्हारे सिर के सौ टुकड़े हो जाते। तुमने यह अनजाने में किया है, इसलिए तुम अभी जीवित हो।’ फिर बोले, ‘हमें हमारे पुत्र के पास ले चलो।’”
“मैं उन्हें वहाँ ले गया। पुत्र के शरीर को छूकर दोनों बिलख पड़े। पिता कहने लगे, ‘अब रात के अंतिम पहर में कौन मुझे मधुर स्वर में शास्त्र सुनाएगा? कौन हमारे लिए कंद-मूल और जल लाएगा?’ फिर दोनों ने पुत्र को जलांजलि दी।”
“तभी वह युवक दिव्य रूप में प्रकट हुआ। उसने माता-पिता को सांत्वना दी कि उनकी सेवा के पुण्य से उसे उत्तम लोक मिला है, और वह स्वर्ग को चला गया।”
“फिर उस शोकाकुल पिता ने मुझसे कहा: ‘जिस तरह आज मैं पुत्र के वियोग में प्राण त्याग रहा हूँ, उसी तरह तुम भी एक दिन पुत्र-शोक में प्राण त्यागोगे।’ इसके बाद दोनों ने अपने पुत्र की चिता में प्रवेश कर देह त्याग दी।”
कथा पूरी कर दशरथ ने कौसल्या से कहा, “आज वह शाप फलित हो रहा है। मेरी आँखें अब कुछ नहीं देख पातीं। काश, एक बार राम को देख पाता…” राम को पुकारते हुए, उसी रात राजा दशरथ ने प्राण त्याग दिए।
बरसों पहले, बिना देखे चलाया गया एक बाण, एक पूरे राजवंश की कथा में इतना बड़ा मोड़ बन गया। और जल का घड़ा लिए वह तपस्वी युवक आज भी माता-पिता की सेवा का सबसे सुंदर उदाहरण माना जाता है।
इस कथा का संदेश
माता-पिता की सेवा सबसे बड़ा पुण्य है; और कोई भी काम बिना देखे-समझे जल्दबाज़ी में नहीं करना चाहिए, क्योंकि कर्म का फल लौटकर आता है।
वाल्मीकि रामायण में इस तपस्वी युवक का नाम नहीं दिया गया है। “श्रवण कुमार” नाम, और उनका अपने अंधे माता-पिता को काँवर (बहँगी) की दो टोकरियों में बिठाकर तीर्थयात्रा कराना, बाद की लोक-परंपरा के प्रसंग हैं। यहाँ कथा वाल्मीकि के वृत्तांत के अनुसार है।
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