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सिद्धिदात्री
स्रोत: शिव पुराण, शतरुद्र संहिता (अर्धनारीश्वर अवतार); सिद्धिदात्री से सिद्धियाँ पाने की कथा: प्रचलित नवदुर्गा परंपरा
सृष्टि के आरंभ में ब्रह्मा जी को जगत रचने का काम मिला। उन्होंने अपने मन के संकल्प से ऋषियों, प्रजापतियों और अनेक प्राणियों की रचना की।
पर एक कठिनाई आ खड़ी हुई। ब्रह्मा जितने प्राणी रचते, उतने ही रह जाते। सृष्टि अपने आप आगे नहीं बढ़ रही थी। हर नए प्राणी के लिए ब्रह्मा को स्वयं संकल्प करना पड़ता।
ब्रह्मा चिंतित हो उठे। “मैं अकेला कब तक रचता रहूँगा? यह सृष्टि अपने आप कैसे फैलेगी?” बहुत सोचने पर भी उन्हें कोई उपाय नहीं सूझा।
तब उन्होंने भगवान शिव का ध्यान किया, जो सबके मूल कारण हैं। ब्रह्मा कठोर तपस्या में बैठ गए और पूरी श्रद्धा से शिव का स्मरण करने लगे। समय बीतता गया, पर उनका ध्यान नहीं टूटा।
प्रचलित नवदुर्गा कथा इससे भी पहले की बात कहती है। वह कहती है कि स्वयं शिव ने आदिशक्ति की उपासना की थी, और उन्हीं की कृपा से शिव को सारी सिद्धियाँ मिली थीं। वही शक्ति अब शिव से अलग नहीं थीं।
ब्रह्मा की तपस्या से प्रसन्न होकर शिव उनके सामने प्रकट हुए। पर जो रूप ब्रह्मा ने देखा, वैसा उन्होंने पहले कभी नहीं देखा था।
उस दिव्य रूप का दाहिना आधा भाग शिव का था: जटाएँ, भस्म, सर्प और त्रिशूल। और बायाँ आधा भाग एक देवी का: केशों में फूल, कानों में कुंडल, और मुख पर करुणा भरी मुस्कान। एक ही शरीर में आधे पुरुष, आधी नारी…
ब्रह्मा ने हाथ जोड़कर उस रूप की स्तुति की। यह भगवान का अर्धनारीश्वर रूप था, जिसमें शिव और शक्ति एक ही शरीर में हैं, कभी अलग न होने वाले।
शिव पुराण बताता है कि तब शिव ने अपने शरीर से शक्ति को अलग किया, और देवी ब्रह्मा के सामने अलग से प्रकट हुईं। ब्रह्मा ने उन्हें प्रणाम करके कहा, “माँ, मेरी सृष्टि आगे नहीं बढ़ रही। मुझे स्त्री-सृष्टि की शक्ति दीजिए, ताकि जगत अपने आप फैल सके।”
देवी ने ब्रह्मा की प्रार्थना स्वीकार की और उन्हें वह शक्ति दी। इसके बाद ब्रह्मा ने स्त्री और पुरुष दोनों की रचना की, और सृष्टि अपने आप बढ़ने लगी। फिर देवी पुनः शिव में ही समा गईं।
प्रचलित नवदुर्गा परंपरा इसी कथा को देवी सिद्धिदात्री से जोड़ती है। उसके अनुसार शिव ने इन्हीं आदिशक्ति की उपासना से आठों सिद्धियाँ पाईं, और इन्हीं की कृपा से उनका आधा शरीर देवी का हुआ, जिससे वे अर्धनारीश्वर कहलाए।
ये आठ सिद्धियाँ हैं: अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व। इन्हें देने वाली होने के कारण देवी सिद्धिदात्री कहलाती हैं।
माँ सिद्धिदात्री कमल पर विराजती हैं और सिंह भी उनका वाहन माना जाता है। उनकी चार भुजाओं में चक्र, गदा, शंख और कमल हैं। मान्यता है कि देवता, ऋषि, सिद्ध, गंधर्व और मनुष्य, सभी उनकी उपासना करते हैं।
नवरात्रि की नौ रातों की साधना सिद्धिदात्री पर आकर पूरी होती है। पहले दिन शैलपुत्री से जो यात्रा शुरू हुई, वह नौवें दिन पूर्णता पर पहुँचती है।
अर्धनारीश्वर का रूप याद दिलाता है कि शिव और शक्ति, पुरुष और प्रकृति, एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं। सृष्टि तभी आगे बढ़ती है जब दोनों साथ हों।
इस कथा का संदेश
पूर्णता किसी एक में नहीं, शिव और शक्ति के मेल में है। जो साधना धैर्य से पूरी होती है, वही सिद्धि बनती है।
शारदीय और चैत्र नवरात्रि के नौवें दिन, महानवमी को, माँ सिद्धिदात्री की पूजा होती है। कई घरों में इस दिन हवन और कन्या पूजन करके नवरात्रि व्रत का पारण किया जाता है। अर्धनारीश्वर की कथा शिव पुराण में है; सिद्धिदात्री से उसका संबंध प्रचलित परंपरा है।
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