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स्कंदमाता

स्रोत: शिव पुराण, रुद्र संहिता, कुमार खंड; नवदुर्गा परंपरा

तारक नाम के असुर ने ब्रह्मा जी की घोर तपस्या की। जब ब्रह्मा प्रसन्न हुए, तो उसने बड़ी चतुराई से वर माँगा: “मेरी मृत्यु केवल शिव के पुत्र के हाथों हो।”

तारक जानता था कि सती के देह-त्याग के बाद शिव गहरे वैराग्य में हैं। न वे विवाह करेंगे, न उनका पुत्र होगा। ब्रह्मा ने वर दे दिया, और तारक स्वयं को अमर समझने लगा।

वर पाकर तारकासुर ने तीनों लोकों में उत्पात मचा दिया। देवताओं को स्वर्ग से निकाल दिया गया। देवताओं के रत्न और वैभव छीन लिए गए। ऋषियों के यज्ञ बंद हो गए।

दुखी देवता ब्रह्मा के पास गए। ब्रह्मा ने कहा, “इसका अंत केवल शिव का पुत्र कर सकता है। और शिव का विवाह केवल हिमालय की पुत्री पार्वती से हो सकता है।”

फिर पार्वती की कठोर तपस्या हुई, और शिव-पार्वती का विवाह संपन्न हुआ। देवताओं की आशा जागी। पर समय बीतता गया, और कोई संतान नहीं हुई। देवता फिर अधीर हो उठे।

देवताओं की प्रार्थना पर अंततः शिव का तेज प्रकट हुआ। पर वह तेज इतना प्रचंड था कि उसे कोई सह न सका। अग्निदेव ने उसे धारण किया, पर वे भी उसकी ज्वाला से जलने लगे।

वह दिव्य तेज एक हाथ से दूसरे हाथ गया, और अंत में गंगा के तट पर सरकंडों के एक घने वन में जा पहुँचा। वहाँ एक अद्भुत प्रकाश फैल गया…

सरकंडों के उस वन, शरवण, में एक तेजस्वी बालक का जन्म हुआ, जिसकी कांति सूर्य जैसी थी। इसीलिए उसे शरवणभव भी कहते हैं।

उसी समय छह कृत्तिकाएँ वहाँ स्नान करने आईं। बालक को देखकर उनके मन में ममता उमड़ आई, और सबने उसे दूध पिलाना चाहा। कथा कहती है कि बालक ने छह मुख धारण कर लिए और छहों माताओं का दूध पिया। इसीलिए वह षण्मुख और कार्तिकेय कहलाया।

जब शिव और पार्वती को इस बालक का पता चला, तो उसे बड़े आनंद से कैलाश लाया गया। पार्वती ने उसे गोद में लिया और ममता से भर उठीं। देवताओं ने उत्सव मनाया।

यही बालक स्कंद और कुमार कहलाया। देवताओं ने उसे अपनी सेना का सेनापति बनाया, और उसे दिव्य अस्त्र भेंट किए। मात्र बालक होते हुए भी उसने देव-सेना का नेतृत्व किया।

कुमार और तारकासुर का भीषण युद्ध हुआ। तारक ने बालक को देखकर हँसी उड़ाई, पर कुमार की शक्ति के आगे वह टिक न सका। अंत में कुमार ने अपने शक्ति नामक भाले से तारकासुर का वध कर दिया। ब्रह्मा का वर सत्य हुआ: शिव के पुत्र के हाथों ही उसका अंत हुआ।

स्कंद की माता होने के कारण देवी पार्वती का यह रूप स्कंदमाता कहलाता है। इस रूप में देवी की चार भुजाएँ हैं। वे बाल स्कंद को गोद में लिए रहती हैं, दो हाथों में कमल धारण करती हैं, और एक हाथ वर मुद्रा में है। वे कमल के आसन पर विराजती हैं, इसलिए उन्हें पद्मासना भी कहते हैं, और उनका वाहन सिंह है।

मान्यता है कि स्कंदमाता की पूजा से स्कंद की पूजा भी अपने आप हो जाती है। वे माँ की उस ममता का रूप हैं जो संतान की रक्षा भी करती है और उसे बड़े लक्ष्य के लिए तैयार भी करती है।

इस कथा का संदेश

माँ की गोद ही सबसे बड़ी शक्ति का पहला घर है। स्कंदमाता सिखाती हैं कि ममता और साहस साथ चलते हैं।

शारदीय और चैत्र नवरात्रि के पाँचवें दिन, पंचमी को, माँ स्कंदमाता की पूजा होती है। कार्तिकेय के जन्म का क्रम अलग-अलग पुराणों और रामायण में कुछ भिन्न रूप से बताया गया है।

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